दस साल पहले जब गूगल ग्लास पहली बार बाजार में आया था, तो निजता को लेकर ऐसा हंगामा मचा कि इस प्रोजेक्ट को पीछे हटना पड़ा। लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर बिना इजाजत रिकॉर्ड होने का डर था। लेकिन आज, मेटा, एप्पल और अन्य टेक दिग्गज एक बार फिर Smart Glasses को हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या पिछले एक दशक में हमारा समाज बदल चुका है? क्या टिकटॉक और व्लॉगिंग के दौर में हम सार्वजनिक रिकॉर्डिंग और कैमरे वाले चश्मों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं या इतिहास खुद को दोहराएगा?
जब पहली बार कैमरे से लैस चश्मे बाजार में पेश किए गए थे, तो समाज इसके लिए तैयार नहीं था। कैफे, थिएटर और सार्वजनिक स्थानों पर इन चश्मों को पहनकर जाने वालों को शक की नजर से देखा जाता था। लोगों को यह बात नागवार गुजरती थी कि कोई बिना उनकी सहमति के उन्हें रिकॉर्ड कर सकता है। इसी विरोध के कारण Google Glass को आम ग्राहकों के लिए बंद करना पड़ा और इसे सिर्फ औद्योगिक उपयोग तक सीमित कर दिया गया।
तकनीक कितनी भी एडवांस क्यों न हो, अगर समाज उसे स्वीकार नहीं करता तो उसका सफल होना असंभव है।
आज की दुनिया 2013 से बिल्कुल अलग है। रील्स, व्लॉग्स और स्मार्टफोन कैमरों ने सार्वजनिक स्थानों पर शूटिंग को बेहद सामान्य बना दिया है। लोग हर पल अपनी जिंदगी को लाइव स्ट्रीम कर रहे हैं। यही वजह है कि टेक कंपनियां मानती हैं कि आज के उपभोक्ता Smart Glasses को लेकर ज्यादा सहज होंगे। मेटा के नए AI चश्मों की बिक्री और लोगों में इनका बढ़ता क्रेज इस बात का सबूत है कि हमारी गोपनीयता की परिभाषा अब बदल चुकी है।
आधुनिक चश्मों में केवल कैमरा ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) जैसे फीचर्स भी मौजूद हैं। ये आपको रास्ता दिखाने से लेकर रियल-टाइम ट्रांसलेशन तक में मदद करते हैं। हालांकि, खतरा अभी भी टला नहीं है:
स्मार्ट टेक का यह नया दौर रोमांचक तो है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक के साथ जिम्मेदारी भी आती है। आने वाले सालों में स्मार्ट ग्लासेस हमारी दिनचर्या का मुख्य हिस्सा बनेंगे या फिर से विरोध का सामना करेंगे, यह देखने वाली बात होगी।
क्या आप अपने दैनिक जीवन में कैमरा वाले स्मार्ट चश्मे पहनना पसंद करेंगे? नीचे कमेंट्स में अपनी राय जरूर शेयर करें!









